दो महान संतों पर खोजपूर्ण आलेख
१ जनार्दन मिश्र
डॉ. धर्मपाल सिंहल एवं डॉ. बलदेव सिंह बद्दन हिंदी और पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक तथा संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं। डॉ0 सिंहल की पंजाबी और हिंदी में 60 से अधिक आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों के अतिरिक्त इनकी अनेक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। डॉ0 बद्दन ने पंजाबी में आलोचना की 20 पुस्तकों के अलावा 20 पुस्तकें संपादित और 12 पुस्तकों का सह-संपादन किया है। दोनों लेखकों की सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक पुरस्कारों से अलंकृत इन दोनों लेखकों के मौलिक एवं शोधपूर्ण लेखन से पंजाब एवं अन्य प्रदेशों के अनेक संतों के आदर्श चरित्र उजागर हुए हैं। 'मंजुली प्रकाशन' से 'प्रकाशित संत कबीर जीवन एवं वाणी' एवं 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' इनके सह लेखन में ऐसी दो शोधपूर्ण कृतियां हैं जिसमें दोनों संतों के जीवन के अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुए हैं।
'मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहो नहीं हाथ' संत कबीर की अपने बारे में ऐसी उक्ति है जो सिद्ध करती है कि कागज कलम से दूर रहने वाला व्यक्ति भी अपने चिंतन मनन से महान विचारक की श्रेणी में आ सकता है।
दो दिन पहले प्रोफेसर टी.आर.सी. सिन्हा ने मुझसे कहा था कि मिश्र जी! संत कबीर के एक दोहा ने मेरे जीवन को बदल दिया। वह दोहा है:-
साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाए ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाए।।
वाकई इस दोहे के अन्तर्गत आर्थिक एवं नैतिक पक्ष का इस तरह समायोजन किया गया है कि उत्तम जीवन के लिए इससे बड़ी सीख कुछ और हो ही नहीं सकती है। मुझे अच्छी तरह याद है कि हिन्दी अकादमी की एक गोष्ठी में आवारा मसीहा के स्वनाम धन्य लेखक विष्णु प्रभाकर एवं जाने-माने लेखक विजयेन्द्र स्नातक मौजूद थे। उस अवसर पर किसी प्रख्यात विद्वान ने बताया था कि अब तक कबीर पर 152 लोग डॉक्टरेट की डिग्री ले चुके हैं।
विषय सूची पर ध्यान दें तो 'संत कबीर जीवन एवं वाणी' कृति को आठ शीर्षकों के अन्तर्गत विभक्त कर दोनों लेखकों ने कुछ ऐसी जानकारियां प्रस्तुत की हैं जो अब तक पाठकों की नजर से ओझल थीं। संतों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वे लोकभाषा में सामान्य जन को समझाने की कोशिश करते हैं। सामान्यतया उनकी नजर में सदा निम्न, प्रताड़ित एवं दुखी लोग होते हैं जिन्हें वे संसार के तथ्यों से अवगत कराना चाहते हैं। संतों की नजर में कोई छोटा बड़ा नहीं होता। वाकई संत अंधविश्वास का खंडन करते हैं और जो अंध विश्वास को बढ़ावा देता है वह संत के भेस में भेड़िया होता है। इस कृति के अनुसार गुरु ग्रंथ सहिब में 15 भक्त कवियों की वाणी दर्ज हैं। और उनके नाम हैं-जैदेव जी, भक्त साधना जी, बाबा शेख फरीद शकर गंज, संत नामदेव जी, संत त्रिलोचन जी, भक्त नामदेव जी, भक्त कबीर जी, संत रविदास जी, भक्त सेन जी, भक्त पीपा जी, भक्त धन्ना जी, संत श्री सूरदास जी, संत परमानंद जी, संत भीषण जी तथा भक्त वेणी जी। जिन भक्त कवियों एवं संतों को इस देश में जाति के आधार पर निम्न श्रेणी में रखा गया था उन भक्तों एवं संतों की वाणियों को गुरु गं्रथ साहिब में स्थान देने से संतों का मान तो बढ़ा ही, गुरु ग्रंथ का भी स्थान बहुत ऊँचा हो गया है।
संत कबीर दास जी के गुरु के विषय में भी पर्याप्त मतभेद पाया जाता हैं। इस विषय में लेखक का मानना है कि संत कबीर के गुरु के विषय में चार मत है। पहला यह कि उनके गुरु रामानंद जी थे। दूसरा यह कि गुरु शेख तकी थे, तीसरा गुरु गुरुनानक देव। चौथा मत है कि संत कबीर दास के गुरु स्वयं परमात्मा ही हैं। कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, अर्थात् कोई देहधारी गुरु नहीं था। इन द्वय लेखकों ने कबीरदास की एक वाणी को उधृत कर के रेखांकित किया है कि उनका गुरु कोई देहधारी नही था। यथा-
जेते औरत मर्द उपानी, सो सब रूप तुम्हारा।
कबीर पोंगड़ा अलह राम का, जो गुर पीर हमारा।।
पर साथ ही उनकी एक और वाणी को उधृत करते हैं-
गुरु गोबिंद दोऊ खडेÞ, काके लागूँ पांइ।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिंद दिओ बतांइ।।
इस दोहा से साफ प्रकट होता है कि कबीर दास गुरु को गोविन्द से भी बड़ा मानते हैं। ऐसे में उनका गुरु भी देहधारी ही होगा। मेरी जानकारी के अनुसार रामानंद स्वामी ही उनके गुरु थे। इन दोनों लेखकों ने भी अनेक लेखकों की चर्चा करते हुए विचार व्यक्त किया है कि संत श्री रामानंद स्वामी उदार चित्त संन्यासी थे। संन्यासी का कोई धर्म, जाति या अन्य कोई बंधन नहीं होता, इसलिए यदि रामानंद जी किसी रविदास जी चमार, सैन नाई, पीपा, राजपूत एवं धन्ना जाट को उपदेश दे सकते हैं तो कबीर जैसे परम संत को क्यों नही शिष्य बना सकते। संत रामानंद जी से धोखे के साथ संत कबीर द्वारा उपदेश लेने या गुरु धारण करने की घटना मनघंड़त घटना है। स्वामी रामानंद जी को तो उनके गुरु स्वामी राघवानंद ने भी इसीलिए अपने से अलग कर दिया था, क्योंकि वे खान-पान एवं मेल-जोल का ब्राह्मणी बंधन स्वीकार नहीं करते थे। एक बात और भी विचारणीय है कि यदि शेख तकी सचमुच कबीर जी के गुरु होते तो वे उन्हें इस बात से बे-बाक तौर पर कभी भी संबोधन नहीं करते-
नाना रूप नचाय के, नाचे नट के भेख।
घट-घट अनिवासी अहै, सुनहु सखी तुम सेख।।
इस कृति में 'भक्तवाणी: लोकवाणी', 'संत कबीर जी: जीवन एवं व्यक्तित्व', 'संत कबीर दास: कुछ जानकारियां', 'संत प्रवर कबीर का समाज-तंत्र' 'जुलरै दीन के हेत संत कबीर','संत कबीर दास: कुछ महत्वपूर्ण स्त्रोत','विभिन्न विद्वानों एवं संतों द्वारा कबीर','आलोचना एवं प्रशंसा' एवं 'वाणी संत कबीर दास जी' शीर्षकों के अन्तर्गत संत कबीर की महानता को रेखांकित किया गया है।
संत श्री नामदेव जी वैष्णव संत थे। वे महाराष्टÑ के थे। वे प्रसिद्ध कीर्तनीय थे। महाराष्टÑ सरकार द्वारा प्रकाशित 'नामदेव गाथा' में उनके हजारों मराठी तथा हिन्दी पद सम्मिलित हैं।
संत नामदेव जी का समय 1270 ईस्वी से 1350 तक का माना जाता है। पांच प्रमुख संतों में गिने जाने वाले संत नामदेव संत झानेश्वर तथा संत त्रिलोचन जी के समकालीन थे। अनेक विद्वानों के अनुसार संत नामदेव जी का जन्म 26 अक्टूबर 1270 ईस्वी (रविवार) को हुआ था।
नामदेव जी गृहस्थ थे। गृहस्थाश्रम निभाते हुए भी इन्होंने प्रभु भक्ति कीं तथा ऊँची-ऊँची स्थितियां ग्रहण कीं। संत नामदेव के परिवार को कुटुम्ब कवि नाम से जाना जाता है, क्योंकि इनके सब पुत्र, पत्नी, दासी संतनी जानाबाई तथा चारों बहुएं अभंग रचना किया करते थे। संत नामदेव जी के समकालीन संत ज्ञानदेव तथा ज्ञानेश्वर बहुत उच्च अवस्था वाले महात्मा थे। कुछ विद्वानों के अनुसार संत नामदेव जी के गुरु संत ज्ञानेश्वर थे।
अपनी इस कृति 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' में इन दोनों लेखकों ने कुछ मतों का खंडन करते हुए सिद्ध किया है कि महाराष्टÑ में पैदा हुए संत नामदेव की वाणी ही गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है। कुछ विद्वानों के अनुसार एक महाराष्टÑ के संत नामदेव जी थे तथा दूसरे पंजाब के नामदेव जी थे। दूसरे यानी पंजाब के संत नामदेव जी की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। पर द्वय लेखकों का मानना है कि महाराष्टÑ वाले संत नामदेव जी बाद में देशाटन करते हुए पंजाब आ गए थे। महाराष्टÑ के संत नामदेव जी महाराज अपने गुरुतुल्य प्रसिद्र संत ज्ञानेश्वर जी के स्वर्गवास से उदासीन होकर तीर्थ पर निकल पड़े थे। भ्रमण करते हुए वे गुरुदास पुर के घुमान नामक स्थान पर आ गए थे जहाँ आजीवन बने रहे थे।
संतों के साथ अकसर चमत्कार की बात होती है। मुसलमान, यहूदी तथा ईसाई तो करामातों को खास-खास मनुष्यों द्वारा प्रभु की विशेष शक्तियां मानते हैं और कहते हैं। ये शक्तियां उन्हें इसलिए दी गई हैं कि वे लोगों के सामने निशानियां पेश करके अपने पैगम्बर होने का सबूत पेश कर सकें।
अलग-अलग परचीकारों ने अपने-अपने ढंग से यह घटना बताई है मगर हमारे लिए संत श्री नामदेव जी द्वारा अपने शब्दों में वर्णित कथा विशेष महत्व रखने वाली है जो गुरु गं्रथ साहिब में दर्ज है
दूधु कटोरै गडवै पानी, कपल गाइ नामै दुहि आनी
दूधु पीआर भगतु धरि गइया।
नामे हरि का दरसनु गइया।।
श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो भगवान कृष्ण भी तो अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते ही हैं। आमतौर पर संतों के साथ विविध चमत्कारिक घटनाओं का संबंध होता ही है। उनके जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित करते समय उनके व्यक्तित्व को उभारने के लिए कुछ लोग उनके चमत्कारिक घटनाओं को रस के साथ सुनाते हैं। वैसे सनातन धर्म में ऋद्धियों-सिद्धियोंं की बात प्राय: की जाती है।
ऋद्धियां सांसारिक उपलब्लियों को कहा जाता है तथा सिद्धियां आध्यात्मिक उत्कृष्टता का नाम है। सिद्धियां आठ मानी गई हैं। आगे प्रत्येक सिद्धि की पुन: आठ-आठ उपसिद्धियां मानी जाती हैं। ऐसे मिलाकर चौसठ सिद्धियां बन जाती हैं।
संत श्री नामदेव जी भक्ति आंदोलन के वास्तविक प्रर्वतक हैं। लेखकों के अनुसार वे वारकारी सम्प्रदाय की विट्ठल अथवा विष्णु के श्रीकृष्ण भक्ति से अपनी भक्ति साधना प्रांरभ करते हैं। प्रेम मार्ग से होते हुए नाम भक्ति तथा निर्गुण ब्रह्म की आराधना वाले वेदांत-गुरमति (जीवन-मूल्यों) की रक्षा करने वाले मस्त मौला एवं ब्रह्मज्ञानी संत मनीषी थे। 'भक्ति आंदोलन एवं संत नामदेव', 'संत नामदेव: प्रामाणिक जीवनी', 'परचीकारों का नामदेव चरित्र', 'चमत्कार बनाम आध्यात्मिक प्राप्ति', 'संत गुरु नामदेव जी का जीवन दर्शन' तथा 'संत नामदेव जी की वाणी' विषय सूची में विभाजित यह कृति संत नामदेव जी की महता रेखांकित करती है।
वर्तनी की जांच करते समय कहीं-कहीं दो शब्दों के बीच की दूरी को दोनों कृतियों में नजर अंदाज कर दिया गया है। 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' की विषय सूची में निर्देेशित पृष्ठ संख्या एवं वास्तविक पृष्ठ संख्या का अलग-अलग होना पाठकों को खटकेगा।
१ जनार्दन मिश्र
डॉ. धर्मपाल सिंहल एवं डॉ. बलदेव सिंह बद्दन हिंदी और पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक तथा संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं। डॉ0 सिंहल की पंजाबी और हिंदी में 60 से अधिक आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों के अतिरिक्त इनकी अनेक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। डॉ0 बद्दन ने पंजाबी में आलोचना की 20 पुस्तकों के अलावा 20 पुस्तकें संपादित और 12 पुस्तकों का सह-संपादन किया है। दोनों लेखकों की सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक पुरस्कारों से अलंकृत इन दोनों लेखकों के मौलिक एवं शोधपूर्ण लेखन से पंजाब एवं अन्य प्रदेशों के अनेक संतों के आदर्श चरित्र उजागर हुए हैं। 'मंजुली प्रकाशन' से 'प्रकाशित संत कबीर जीवन एवं वाणी' एवं 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' इनके सह लेखन में ऐसी दो शोधपूर्ण कृतियां हैं जिसमें दोनों संतों के जीवन के अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुए हैं।
'मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहो नहीं हाथ' संत कबीर की अपने बारे में ऐसी उक्ति है जो सिद्ध करती है कि कागज कलम से दूर रहने वाला व्यक्ति भी अपने चिंतन मनन से महान विचारक की श्रेणी में आ सकता है।
दो दिन पहले प्रोफेसर टी.आर.सी. सिन्हा ने मुझसे कहा था कि मिश्र जी! संत कबीर के एक दोहा ने मेरे जीवन को बदल दिया। वह दोहा है:-
साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाए ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाए।।
वाकई इस दोहे के अन्तर्गत आर्थिक एवं नैतिक पक्ष का इस तरह समायोजन किया गया है कि उत्तम जीवन के लिए इससे बड़ी सीख कुछ और हो ही नहीं सकती है। मुझे अच्छी तरह याद है कि हिन्दी अकादमी की एक गोष्ठी में आवारा मसीहा के स्वनाम धन्य लेखक विष्णु प्रभाकर एवं जाने-माने लेखक विजयेन्द्र स्नातक मौजूद थे। उस अवसर पर किसी प्रख्यात विद्वान ने बताया था कि अब तक कबीर पर 152 लोग डॉक्टरेट की डिग्री ले चुके हैं।
विषय सूची पर ध्यान दें तो 'संत कबीर जीवन एवं वाणी' कृति को आठ शीर्षकों के अन्तर्गत विभक्त कर दोनों लेखकों ने कुछ ऐसी जानकारियां प्रस्तुत की हैं जो अब तक पाठकों की नजर से ओझल थीं। संतों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वे लोकभाषा में सामान्य जन को समझाने की कोशिश करते हैं। सामान्यतया उनकी नजर में सदा निम्न, प्रताड़ित एवं दुखी लोग होते हैं जिन्हें वे संसार के तथ्यों से अवगत कराना चाहते हैं। संतों की नजर में कोई छोटा बड़ा नहीं होता। वाकई संत अंधविश्वास का खंडन करते हैं और जो अंध विश्वास को बढ़ावा देता है वह संत के भेस में भेड़िया होता है। इस कृति के अनुसार गुरु ग्रंथ सहिब में 15 भक्त कवियों की वाणी दर्ज हैं। और उनके नाम हैं-जैदेव जी, भक्त साधना जी, बाबा शेख फरीद शकर गंज, संत नामदेव जी, संत त्रिलोचन जी, भक्त नामदेव जी, भक्त कबीर जी, संत रविदास जी, भक्त सेन जी, भक्त पीपा जी, भक्त धन्ना जी, संत श्री सूरदास जी, संत परमानंद जी, संत भीषण जी तथा भक्त वेणी जी। जिन भक्त कवियों एवं संतों को इस देश में जाति के आधार पर निम्न श्रेणी में रखा गया था उन भक्तों एवं संतों की वाणियों को गुरु गं्रथ साहिब में स्थान देने से संतों का मान तो बढ़ा ही, गुरु ग्रंथ का भी स्थान बहुत ऊँचा हो गया है।
संत कबीर दास जी के गुरु के विषय में भी पर्याप्त मतभेद पाया जाता हैं। इस विषय में लेखक का मानना है कि संत कबीर के गुरु के विषय में चार मत है। पहला यह कि उनके गुरु रामानंद जी थे। दूसरा यह कि गुरु शेख तकी थे, तीसरा गुरु गुरुनानक देव। चौथा मत है कि संत कबीर दास के गुरु स्वयं परमात्मा ही हैं। कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, अर्थात् कोई देहधारी गुरु नहीं था। इन द्वय लेखकों ने कबीरदास की एक वाणी को उधृत कर के रेखांकित किया है कि उनका गुरु कोई देहधारी नही था। यथा-
जेते औरत मर्द उपानी, सो सब रूप तुम्हारा।
कबीर पोंगड़ा अलह राम का, जो गुर पीर हमारा।।
पर साथ ही उनकी एक और वाणी को उधृत करते हैं-
गुरु गोबिंद दोऊ खडेÞ, काके लागूँ पांइ।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिंद दिओ बतांइ।।
इस दोहा से साफ प्रकट होता है कि कबीर दास गुरु को गोविन्द से भी बड़ा मानते हैं। ऐसे में उनका गुरु भी देहधारी ही होगा। मेरी जानकारी के अनुसार रामानंद स्वामी ही उनके गुरु थे। इन दोनों लेखकों ने भी अनेक लेखकों की चर्चा करते हुए विचार व्यक्त किया है कि संत श्री रामानंद स्वामी उदार चित्त संन्यासी थे। संन्यासी का कोई धर्म, जाति या अन्य कोई बंधन नहीं होता, इसलिए यदि रामानंद जी किसी रविदास जी चमार, सैन नाई, पीपा, राजपूत एवं धन्ना जाट को उपदेश दे सकते हैं तो कबीर जैसे परम संत को क्यों नही शिष्य बना सकते। संत रामानंद जी से धोखे के साथ संत कबीर द्वारा उपदेश लेने या गुरु धारण करने की घटना मनघंड़त घटना है। स्वामी रामानंद जी को तो उनके गुरु स्वामी राघवानंद ने भी इसीलिए अपने से अलग कर दिया था, क्योंकि वे खान-पान एवं मेल-जोल का ब्राह्मणी बंधन स्वीकार नहीं करते थे। एक बात और भी विचारणीय है कि यदि शेख तकी सचमुच कबीर जी के गुरु होते तो वे उन्हें इस बात से बे-बाक तौर पर कभी भी संबोधन नहीं करते-
नाना रूप नचाय के, नाचे नट के भेख।
घट-घट अनिवासी अहै, सुनहु सखी तुम सेख।।
इस कृति में 'भक्तवाणी: लोकवाणी', 'संत कबीर जी: जीवन एवं व्यक्तित्व', 'संत कबीर दास: कुछ जानकारियां', 'संत प्रवर कबीर का समाज-तंत्र' 'जुलरै दीन के हेत संत कबीर','संत कबीर दास: कुछ महत्वपूर्ण स्त्रोत','विभिन्न विद्वानों एवं संतों द्वारा कबीर','आलोचना एवं प्रशंसा' एवं 'वाणी संत कबीर दास जी' शीर्षकों के अन्तर्गत संत कबीर की महानता को रेखांकित किया गया है।
संत श्री नामदेव जी वैष्णव संत थे। वे महाराष्टÑ के थे। वे प्रसिद्ध कीर्तनीय थे। महाराष्टÑ सरकार द्वारा प्रकाशित 'नामदेव गाथा' में उनके हजारों मराठी तथा हिन्दी पद सम्मिलित हैं।
संत नामदेव जी का समय 1270 ईस्वी से 1350 तक का माना जाता है। पांच प्रमुख संतों में गिने जाने वाले संत नामदेव संत झानेश्वर तथा संत त्रिलोचन जी के समकालीन थे। अनेक विद्वानों के अनुसार संत नामदेव जी का जन्म 26 अक्टूबर 1270 ईस्वी (रविवार) को हुआ था।
नामदेव जी गृहस्थ थे। गृहस्थाश्रम निभाते हुए भी इन्होंने प्रभु भक्ति कीं तथा ऊँची-ऊँची स्थितियां ग्रहण कीं। संत नामदेव के परिवार को कुटुम्ब कवि नाम से जाना जाता है, क्योंकि इनके सब पुत्र, पत्नी, दासी संतनी जानाबाई तथा चारों बहुएं अभंग रचना किया करते थे। संत नामदेव जी के समकालीन संत ज्ञानदेव तथा ज्ञानेश्वर बहुत उच्च अवस्था वाले महात्मा थे। कुछ विद्वानों के अनुसार संत नामदेव जी के गुरु संत ज्ञानेश्वर थे।
अपनी इस कृति 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' में इन दोनों लेखकों ने कुछ मतों का खंडन करते हुए सिद्ध किया है कि महाराष्टÑ में पैदा हुए संत नामदेव की वाणी ही गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है। कुछ विद्वानों के अनुसार एक महाराष्टÑ के संत नामदेव जी थे तथा दूसरे पंजाब के नामदेव जी थे। दूसरे यानी पंजाब के संत नामदेव जी की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। पर द्वय लेखकों का मानना है कि महाराष्टÑ वाले संत नामदेव जी बाद में देशाटन करते हुए पंजाब आ गए थे। महाराष्टÑ के संत नामदेव जी महाराज अपने गुरुतुल्य प्रसिद्र संत ज्ञानेश्वर जी के स्वर्गवास से उदासीन होकर तीर्थ पर निकल पड़े थे। भ्रमण करते हुए वे गुरुदास पुर के घुमान नामक स्थान पर आ गए थे जहाँ आजीवन बने रहे थे।
संतों के साथ अकसर चमत्कार की बात होती है। मुसलमान, यहूदी तथा ईसाई तो करामातों को खास-खास मनुष्यों द्वारा प्रभु की विशेष शक्तियां मानते हैं और कहते हैं। ये शक्तियां उन्हें इसलिए दी गई हैं कि वे लोगों के सामने निशानियां पेश करके अपने पैगम्बर होने का सबूत पेश कर सकें।
अलग-अलग परचीकारों ने अपने-अपने ढंग से यह घटना बताई है मगर हमारे लिए संत श्री नामदेव जी द्वारा अपने शब्दों में वर्णित कथा विशेष महत्व रखने वाली है जो गुरु गं्रथ साहिब में दर्ज है
दूधु कटोरै गडवै पानी, कपल गाइ नामै दुहि आनी
दूधु पीआर भगतु धरि गइया।
नामे हरि का दरसनु गइया।।
श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो भगवान कृष्ण भी तो अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते ही हैं। आमतौर पर संतों के साथ विविध चमत्कारिक घटनाओं का संबंध होता ही है। उनके जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित करते समय उनके व्यक्तित्व को उभारने के लिए कुछ लोग उनके चमत्कारिक घटनाओं को रस के साथ सुनाते हैं। वैसे सनातन धर्म में ऋद्धियों-सिद्धियोंं की बात प्राय: की जाती है।
ऋद्धियां सांसारिक उपलब्लियों को कहा जाता है तथा सिद्धियां आध्यात्मिक उत्कृष्टता का नाम है। सिद्धियां आठ मानी गई हैं। आगे प्रत्येक सिद्धि की पुन: आठ-आठ उपसिद्धियां मानी जाती हैं। ऐसे मिलाकर चौसठ सिद्धियां बन जाती हैं।
संत श्री नामदेव जी भक्ति आंदोलन के वास्तविक प्रर्वतक हैं। लेखकों के अनुसार वे वारकारी सम्प्रदाय की विट्ठल अथवा विष्णु के श्रीकृष्ण भक्ति से अपनी भक्ति साधना प्रांरभ करते हैं। प्रेम मार्ग से होते हुए नाम भक्ति तथा निर्गुण ब्रह्म की आराधना वाले वेदांत-गुरमति (जीवन-मूल्यों) की रक्षा करने वाले मस्त मौला एवं ब्रह्मज्ञानी संत मनीषी थे। 'भक्ति आंदोलन एवं संत नामदेव', 'संत नामदेव: प्रामाणिक जीवनी', 'परचीकारों का नामदेव चरित्र', 'चमत्कार बनाम आध्यात्मिक प्राप्ति', 'संत गुरु नामदेव जी का जीवन दर्शन' तथा 'संत नामदेव जी की वाणी' विषय सूची में विभाजित यह कृति संत नामदेव जी की महता रेखांकित करती है।
वर्तनी की जांच करते समय कहीं-कहीं दो शब्दों के बीच की दूरी को दोनों कृतियों में नजर अंदाज कर दिया गया है। 'संत नामदेव जीवन एवं वाणी' की विषय सूची में निर्देेशित पृष्ठ संख्या एवं वास्तविक पृष्ठ संख्या का अलग-अलग होना पाठकों को खटकेगा।
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