माँ
समुद्र के दिल से उठने वाली वो लहर हूँ मैं,
पतझड़ में गिरने वाली वो सूखी पत्ती हूँ मैं,
बहार में आने वाली वो नन्हीं कली हूँ मैं,
पर्वत को छूने वाली वो ऊँचाई हूँ मैं,
बरसात में बरसने वाली वो छोटी बूँद हूँ मैं,
आकाश में उमड़ने वाली वो घटा हूँ मैं,
स्वर्ग में रहने वाली वो परी हूँ मैं,
नींदों में छाने वाली वो मिठ नींदिया हूँ मैं,
सपनों में सजने वाली वो सोच हूँ मैं,
दुआओं में रहने वाली वो फरियाद हूँ मैं,
मौसम में आने वाली वो वसंत हूँ मैं,
आँखों में रहने वाली वो आँसू हूँ मैं,
प्यार के दामन में लिपटी वो सौगात हूँ मैं,
हर नज्Þम में बसने वाली वो 'आहें' हूँ मैं,
धड़कन में चलने वाली वो साँसे हूँ मैं,
तुम्हारी हँसी से खुश होने वाली वो खुशी हूँ मैं,
फिक्र में तड़प उठने वाली वो ममता हूँ मैं,
तुम्हें जान से ज्यादा चाहने वाली वो 'माँ' हूँ मैं,।।
खुशबू शर्मा
द्वितीय वर्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय
No comments:
Post a Comment